गरबे में बेटियों का आत्मरक्षा प्रदर्शन, डांडिया की जगह थामी तलवारें
सागर। नवरात्रि पर्व पर इस बार सागर शहर में एक अनोखा और प्रेरणादायक दृश्य देखने को मिला। सिंहस्थ गरबा महोत्सव में बेटियों ने जहां पारंपरिक परिधानों में गरबे की लय पर कदम थिरकाए, वहीं आत्मरक्षा का संदेश देने के लिए डांडिया की जगह तलवारें थामकर शक्ति का परिचय भी दिया। आयोजन में मातृशक्ति के हाथों में लकड़ी से बनी करीब 200 तलवारें सौंपी गईं, जिनसे उन्होंने गरबा खेलते हुए यह साबित किया कि नारी अब केवल संस्कृति और परंपरा की संरक्षक ही नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर अपनी सुरक्षा स्वयं करने में भी सक्षम है।
आयोजक लकी सराफ ने बताया कि समाज में बढ़ते महिला उत्पीड़न, दुष्कर्म और हत्या जैसे जघन्य अपराधों को देखते हुए इस वर्ष गरबे को आत्मरक्षा प्रशिक्षण से जोड़ा गया है। उनका कहना है कि बहन-बेटियों को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाना ही आयोजन का मुख्य उद्देश्य है। सराफ ने कहा, “ऑपरेशन सिंदूर में हमारी बहनों ने जिस पराक्रम का प्रदर्शन किया था, उसने यह सिद्ध कर दिया कि महिलाएं साहस और शक्ति की प्रतीक हैं। उसी से प्रेरणा लेकर इस बार गरबे में भी आत्मरक्षा का प्रशिक्षण जोड़ा गया है।”
कार्यक्रम की सबसे खास झलक उस समय सामने आई, जब महज आठ वर्ष की एक नन्हीं बालिका ने भी तलवार से गरबा किया। मंच पर उसकी ऊर्जा और आत्मविश्वास देखकर मौजूद जनसमूह तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। इस दृश्य ने यह संदेश दिया कि आत्मरक्षा की शिक्षा बचपन से ही दी जाए तो बेटियां और भी आत्मनिर्भर बन सकती हैं।
गरबा महोत्सव में महिलाओं ने तलवारों के साथ नृत्य करते हुए न केवल मां दुर्गा के शक्ति स्वरूप का प्रतीकात्मक प्रदर्शन किया, बल्कि समाज को यह भी बताया कि आज की नारी समय आने पर दुष्टों का संहार करने में पीछे नहीं हटेगी। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए और सभी ने इस अनोखे प्रयोग की सराहना की।
इस अनूठे आयोजन से यह साफ है कि नवरात्रि पर्व केवल आस्था और उत्सव का प्रतीक ही नहीं, बल्कि सामाजिक संदेश देने का भी माध्यम बन सकता है। बेटियों द्वारा तलवारों से किया गया गरबा आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत है और यह संदेश देता है कि आत्मरक्षा ही सच्चे अर्थों में सशक्तिकरण की ओर पहला कदम है।








